टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती

अब रो के भी आँखों की जलन कम नहीं होती

कितने भी घनेरे हों तिरी ज़ुल्फ़ के साए
इक रात में सदियों की थकन कम नहीं होती

होंटों से पिएंचाहे निगाहों से चुराएं
ज़ालिम तिरी ख़ुशबू-ए-बदन कम नहीं होती

मिलना है तो मिल जाओ यहीं हश्र में क्या है
इक उम्र मिरे वादा-शिकन कम नहीं होती

'क़ैसर' की ग़ज़ल से भी न टूटी ये रिवायत
इस शहर में ना-क़दरी-ए-फ़न कम नहीं होती

— Qaisar-ul-Jafri

More by Qaisar-ul-Jafri

Other ghazal from the same pen

See all from Qaisar-ul-Jafri →

Andhera Shayari

Shers of andhera.

All Andhera Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling