न सवाल-ए-जाम न ज़िक्र-ए-मय उसी बाँकपन से चले गए

तिरा ज़र्फ़ देख के तिश्ना-लब तिरी अंजुमन से चले गए

कभी तू ने सोचा भी सुब्ह-ए-नौ कि तमाम रात गुज़ार के
जिन्हें डस गई तिरी रौशनी वो कहाँ वतन से चले गए

मुझे धुन कि काकुल-ए-ज़िंदगी जो बिखर गई है सँवार दूँ
तुम्हें ग़म कि इश्क़ के तज़्किरे मिरे शेर-ओ-फ़न से चले गए

तिरे गेसुओं से अज़ीज़ थीं जिन्हें काएनात की उलझनें
तिरा ग़म समेट के रूह में तिरी अंजुमन से चले गए

मिरे दिल को 'क़ैसर'-ए-बे-नवा कोई ग़म शिकस्त न दे सका
कि उलझ के सैकड़ों हादसे मिरे बाँकपन से चले गए

— Qaisar-ul-Jafri

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