मायूसी की बर्फ़ पड़ी थी लेकिन मौसम सर्द न था

आज से पहले दिल में यारो! इतना ठंडा दर्द न था

तन्हाई की बोझल रातें पहले भी तो बरसी थीं
ज़ख़्म नहीं थे इतने क़ातिल ग़म इतना बे-दर्द न था

फिरते हैं अब रुस्वा होते कल तक ये रफ़्तार न थी
शहर में थीं सौ कू-ए-मलामत दिल आवारा-गर्द न था

मरने पर भी लौ देती थी दीवाने के दिल की आग
पथराई थीं आँखें लेकिन फूल सा चेहरा ज़र्द न था

हर्फ़-ए-तसल्ली मौज-ए-हवा थे मौज-ए-हवा से होता क्या
सीने का पत्थर था 'क़ैसर', ग़म दामन की गर्द न था

— Qaisar-ul-Jafri

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