वो सियाह रात मेरे हुजरे में गुज़ार कर
जा रहा है शौक़ से वो रौशनी पसार कर
मुद्दतों के बा'द एक लंबा इंतिज़ार कर
माज़ी अब निकल पड़ा है पैरहन उतार कर
अपने हम-नफ़स को अपना ख़ास राज़दार कर
क़त्ल कर लिया है ख़ुद का उस पे ऐतिबार कर
जिस के दाग़ मैं ने अपने ख़ून से भी धोए हैं
क़र्ज़ वो चुका रहा है मुझ को दाग़दार कर
ये ग़म-ए-फ़िराक़ दश्त में सराब जैसा था
लोग तो बड़े ही ख़ुश थे मुझ को दर किनार कर
— Pravendra Anuragi















