वर्ना तो है ही क्या जो मिरे घर में नहीं है
पर चाहिए जो शख़्स मुक़द्दर में नहीं है
हर रोज़ सताती है यही बात मुझे तो
क्यूँ बेहतरी उस की मेरे बेहतर में नहीं है
इक बार भी सोचे कभी घर तोड़ने के बा'द
इतनी सी मुहब्बत भी सितमगर में नहीं है
ढोता हूँ सभी ज़ख़्म यही सोच के मैं तो
जो बात तेरे ढब में है ख़ंजर में नहीं है
तुम लूट के ले जाते हो साहिल के ख़ज़ाने
फिर सोचते हो नर्मी समंदर में नहीं है
कह देता है क्यूँ शे'र वो हालात पे मेरे
क्या थोड़ी सी भी अक़्ल सुख़न-वर में नहीं है
हर रोज़ यही सोच के जाता हूँ कमाने
ग़ुर्बत मेरे बच्चों के मुक़द्दर में नहीं है
— Pravendra Anuragi















