ख़फ़ा क्यूँँ हो ऐसे ज़रा मुस्कुरा दो
ख़ता ग़र मिरी है तो मुझ को सज़ा दो
नहीं रुक रहे हैं ये आँसू तुम्हारे
लो ऐसा करो तुम मुझे भी रुला दो
बिना तुम को देखे जी लगता नहीं है
सो रुख़ से तुम अपने ये पर्दा हटा दो
सताता है मुझ को तग़ाफ़ुल तुम्हारा
मुझे बेरुख़ी का सबब तुम बता दो
ये चाहत है ऐसी कि सब कुछ लुटा दूँ
सुनो मेरी चाहत का कुछ तो सिला दो
कि करनी हैं बातें लबों को लबों से
चलो जान-ए-जाँ अब ये दूरी मिटा दो
— Prakash Pandey















