वादियों में मय-नोश का आलम क्या होगा

पी के उस मद-होश का आलम क्या होगा

चख ली उस की आँखों की मय जिस जिस ने
उन के अक़्ल-ओ-होश का आलम क्या होगा

चूड़ियाँ इतराती हों जिस की क़लाई में
फिर उस के आग़ोश का आलम क्या होगा

मैं ने सिर्फ़ तसव्वुर ही किया ख़यालाना
उस के हम-आग़ोश का आलम क्या होगा

कोई कांटा गर धोखे से चुभ जाए
मेरे उस गुल-पोश का आलम क्या होगा

तुम बस मेरी आँखों में देखो और फिर
देखो मेरे जोश का आलम क्या होगा

डूबें हैं महबूब की यादों में यूँ कमाल
आज हमा-तन-गोश का आलम क्या होगा

— Abuzar kamaal

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