ग़ज़ल कही है हदीस-ए-ग़म-ए-जहाँ की तरह

सुनेंगे लोग इसे अपनी दास्ताँ की तरह

फ़रेब देता हूँ दुनिया को इंकिसारी का
मैं अपने आप में फैला हूँ आसमाँ की तरह

क़दम क़दम पे ज़िया-बारियाँ मआ'ज़-अल्लाह
ये रहगुज़र है कि फैली है कहकशाँ की तरह

ये गुल तो गुल हैं चमन को न बेच दें ज़ालिम
जो रूप अपना बनाए हैं बाग़बाँ की तरह

ज़रूर साज़िश-ए-कलक-ए-अज़ल थी कुछ इस में
पड़ा हूँ एक तरफ़ हर्फ़-ए-राएगाँ की तरह

कहाँ था मेरा नशेमन मैं सब से पूछ आया
किसी का घर न जले मेरे आशियाँ की तरह

टटोल लेना ज़रा उन की आस्तीनें भी
जो तुम से हाथ मिलाते हैं राज़-दाँ की तरह

वो जिन का राज़-ए-मोहब्बत था बे-नियाज़ हुए
हम उन का राज़ छुपाए हैं अपनी जाँ की तरह

कोई तो जान पे खेले है बन के परवाना
जला करे है कोई शम्अ-ए-बे-ज़बाँ की तरह

मिले तो क़ाफ़िले सौ सौ शिकस्ता-पा थे हमीं
उठ उठ के बैठ गए गर्द-ए-कारवाँ की तरह

— Panna Lal Noor

More by Panna Lal Noor

Other ghazal from the same pen

See all from Panna Lal Noor →

Aasman Shayari

Shers of aasman.

All Aasman Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling