कुछ ऐसे दो-जहाँ से राब्ता रक्खा गया है
कि इन ख़्वाबीदा आँखों को खुला रक्खा गया है
मिरी आँखों में अब तू रेत पाएगा न पानी
यहाँ दरिया न सहरा बस ख़ला रक्खा गया है
पस-ए-पर्दा गले मिल कर वो शायद रो पड़ेंगे
जिन्हें पूरी कहानी में जुदा रक्खा गया है
— Pallav Mishra















