चंद अल्फ़ाज़ कुछ अहवाल बचा रखे हैं

हम ने दो एक ही आ'माल बचा रखे हैं

पहले गाते थे बजाते थे हवाओं के मिज़ाज
अब तो टूटे हुए सुर-ताल बचा रखे हैं

उड़ गए हुस्न-ओ-जवानी के परिंदे कब के
हाँ तसव्वुर में ख़द-ओ-ख़ाल बचा रखे हैं

बैठा करता था कभी आ के जो ताइर उस के
इक दरीचे ने पर-ओ-बाल बचा रखे हैं

एक नादीदा सनम भी है कहीं तेरे सिवा
उस की ख़ातिर ये मह-ओ-साल बचा रखे हैं

— Om Prabhakar

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