शिकस्त-ए-जाँ से सिवा भी है कार-ए-फ़न क्या क्या

अज़ाब खींच रहा है मिरा बदन क्या क्या

न कोई हिज्र का दिन है न कोई वस्ल की रात
मगर वो शख़्स कि है जान-ए-अंजुमन क्या क्या

अदा हुई है कई बार तर्क-ए-इश्क़ की रस्म
मगर है सर पे वही क़र्ज़-ए-जान-ओ-तन क्या क्या

निगाह-ए-बुलहवसाँ हाए क्या क़यामत है
बदल रहे हैं गुल-ओ-लाला पैरहन क्या क्या

गुज़र गए तो गुज़रते रहे बहुत ख़ुर्शीद
जो रंग लाई तो लाई है इक किरन क्या क्या

क़रीब था कि मैं कार-ए-जुनूँ से बाज़ आऊँ
खिंची ख़याल में तस्वीर-ए-कोह-कन क्या क्या

— Obaidullah Aleem

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