कमाल-ए-आदमी की इंतिहा है

वो आइंदा में भी सब से बड़ा है

कोई रफ़्तार होगी रौशनी की
मगर वो उस से भी आगे गया है

जहाँ बैठे सदा-ए-ग़ैब आई
ये साया भी उसी दीवार का है

मुजस्सम हो गए सब ख़्वाब मेरे
मुझे मेरा ख़ज़ाना मिल गया है

हक़ीक़त एक है लज़्ज़त में लेकिन
हिकायत सिलसिला-दर-सिलसिला है

यूँही हैराँ नहीं हैं आँख वाले
कहीं इक आइना रक्खा हुआ है

विसाल-ए-यार से पहले मोहब्बत
ख़ुद अपनी ज़ात का इक रास्ता है

सलामत आइने में एक चेहरा
शिकस्ता हो तो कितना देखता है

— Obaidullah Aleem

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