भीड़ है लोगों की हर सू आश्ना कोई नहीं
मैं किसे आवाज़ दूँ पहचानता कोई नहीं
अन-गिनत पत्ते गिरे पेड़ों से अश्कों की तरह
अब की रुत में हादसों की इंतिहा कोई नहीं
मेरे दिल में चाँद रौशन मेरी पलकों पर नुजूम
मैं ज़मीं पर आसमाँ हूँ जानता कोई नहीं
आप के नक़्श-ए-क़दम भी अब नहीं मंज़िल-नुमा
लौट जाने का भी अब तो रास्ता कोई नहीं
दुश्मनों को भी जो दर्स-ए-दोस्ती देता रहे
इस सितमगर दौर में इतना बड़ा कोई नहीं
किस क़दर बेगानगी है शह्र-ए-बे-एहसास में
आदमी से आदमी का राब्ता कोई नहीं
बे-तलब किस के गले में डाल दूँ इस हार को
मुझ से मेरी ज़िंदगी भी माँगता कोई नहीं
क्या वज़ाहत मैं करूँ क्या लोग होंगे मुतमइन
तुझ को मेरी आँख से तो देखता कोई नहीं
रात के पिछले पहर 'नुसरत' किसे आवाज़ दूँ
सो रहा है शह्र सारा जागता कोई नहीं















