लड़ी जो काम से क़िस्मत तो ख़ूब लड़ने दी
उजड़ने लग गई दुनिया तो फिर उजड़ने दी
फटा पुराना ही पहना लिबास रिश्तों का
कहीं से उधड़ी सिलाई तो बस उधड़ने दी
न अपनी धूप बिगाड़ी किसी के साए में
न अपने साए तले और की बिगड़ने दी
— Nivesh sahu
उजड़ने लग गई दुनिया तो फिर उजड़ने दी
फटा पुराना ही पहना लिबास रिश्तों का
कहीं से उधड़ी सिलाई तो बस उधड़ने दी
न अपनी धूप बिगाड़ी किसी के साए में
न अपने साए तले और की बिगड़ने दी
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