दिमाग़ फिर सा गया है कुछ एक सालों से
ख़याल भी नहीं मिलते हैं हम-ख़यालों से
रिहा हुआ जो मैं ज़ंजीर-ए-कार-ए-दुनिया से
तो खेलता रहा शब भर किसी के बालों से
मेरा हबीब उदासी की ओर बढ़ता गया
वो मुत्मइन ही नहीं था मेरी मिसालों से
बस एक मैं ही नहीं उस के ज़िक्र से मरबूत
उसे भी जाना गया है मेरे हवालों से
डरा डरा है मेरी जान मेरी फ़िक्र का बन
तेरे ख़याल के इन भागते ग़ज़ालों से
— Nivesh sahu















