वो ख़ुश-लिबास भी ख़ुश-दिल भी ख़ुश-अदा भी है

मगर वो एक है क्यूँ उस से ये गिला भी है

हमेशा मंदिर-ओ-मस्जिद में वो नहीं रहता
सुना है बच्चों में छुप कर वो खेलता भी है

न जाने एक में उस जैसे और कितने हैं
वो जितना पास है उतना ही वो जुदा भी है

वही अमीर जो रोज़ी-रसाँ है आलम का
फ़क़ीर बन के कभी भीक माँगता भी है

अकेला होता तो कुछ और फ़ैसला होता
मिरी शिकस्त में शामिल मिरी दुआ भी है

— Nida Fazli

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