क़ैस जितने भी बने हैं इश्क़ में
सब के सब मारे गए हैं इश्क़ में
जो है मक़्तल पहले कू-ए-यार था
क़त्ल होने सो खड़े हैं इश्क़ में
फूल देकर तुम रवाना हो गई
वरना बोसे भी मिले हैं इश्क़ में
ज़ोर बस राधा का चलता है यहाँ
श्याम तो हारे हुए हैं इश्क़ में
मय-कदे हैं शहर भर में एक दो
और लाखों दिल जले हैं इश्क़ में
— Neeraj jha















