फ़क़त सूरत नहीं तेरी अदा भी जान लेती है

कभी आँखें कभी ज़ुल्फ़ें कभी मुस्कान लेती है

तेरे टूटे हुए दिल को दोबारा जोड़ सकते हैं
मगर तू हम ग़रीबों के कहाँ एहसान लेती है

ज़रा सी देर रहने दे इसी के छाँव में मुझ को
तेरी ये रेशमी चुन्नी मेरा ग़म छान लेती है

नए लड़कों न इतराओ यही वो उम्र है जिस
में
मोहब्बत छोड़ जाती है उदासी जान लेती है

— Neeraj jha

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Mehboob Shayari

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