कभी ख़ामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे,
मैं उतना याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगे।
कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुम से,
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे।
कभी दुनिया मुकम्मल बन के आएगी निगाहों में,
कभी मेरे कभी दुनिया की हर एक शह में पाओगे।
कहीं पर भी रहें हम तुम मोहब्बत फिर मोहब्बत है,
तुम्हें हम याद आएँगे हमें तुम याद आओगे।
— Nazeer Banarasi















