हवा के साथ उड़ कर भी मिला क्या
किसी तिनके से आलम सर हुआ क्या
सबक़ बन पाई है इक भी सज़ा क्या
तो ऐसी मुंसिफ़ी का फ़ाइदा क्या
ये अहसाँ है ज़मीं का आ
समाँ पर
वगरना कोई क़तरा लौटता क्या
बदल सकते नहीं पल में अनासिर
हज़ारों साल मैं सोता रहा क्या
मेरे दिल में ठहरना चाहते हो
ज़रा फिर से कहो – तुम ने कहा क्या
डरा-धमका के बदलोगे ज़माना
अमाँ ! तुम ने धतूरा खा लिया क्या
उन्हें लगता है बाकी सब ग़लत हैं
वो ख़ेमा साम्प्रदायिक हो गया क्या
अंधेरे यूँ ही तो घिरते नहीं हैं
उजालों ने किनारा कर लिया क्या
— Navin C. Chaturvedi















