कई क़िस्से अधूरे रह गए अपनी कहानी में

चले आए हैं बचपन को गँवा के नौजवानी में

हवाएँ जो बग़ावत पर उतर आई हैं आख़िर में
किसी तूफ़ान की दस्तक है मेरी ज़िंदगानी में

नई फ़स्लों को ये कुछ और से कुछ और करते हैं
गुलाबों की जो ख़ुशबू ढूँढ़ते है रातरानी में

हमें आ कर बताते हैं उजालों की सभी फ़ितरत
कभी रौशन न हो पाए थे जो अपनी जवानी में

तू हर इक बात पे जो रूठ के जाने को कहता है
तिरा किरदार है बेहद अहम मेरी कहानी में

ये मेरा वक़्त है इस वक़्त की अपनी रवानी है
जगा सकता हूँ अपनी प्यास भी मैं आग-पानी में

— nakul kumar

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