तुम्हारे चेहरे पे ध्यान ऐसे टिका हुआ है
तमाम सम्तों को एक जानिब रखा हुआ है
हरे दरख़्तों से बेलें कैसे लिपट रही हैं
ज़मीन पर आसमान कैसे झुका हुआ है
वो एक लड़की जो मर रही है हया के मारे
वो एक लड़का जो देखने पर तुला हुआ है
शब-ए-विसाल उस का सुर्ख़ आँचल मुसल्ला कर के
बदन-वज़ीफ़े का विर्द जारी रखा हुआ है
तू सिर्फ़ वहशत के दम पे दिल-दश्त में ना आना
ये इस्म भी राएगाँ है मेरा पढ़ा हुआ है
फिर उस के बा'द उस ने मेरी आँखें भी गीली कर दीं
मैं पूछ बैठा था तेरी आँखों को क्या हुआ है
ये वक़्त-ए-मग़रिब से क़ब्ल का आफ़्ताब 'सरमद'
ये उस के हाथों में कैसे कैसे लगा हुआ है















