का'बा काशी, गंगा जमना, कूचा और बाज़ार सखी

उस के दो नैनों के आगे सब कुछ है बेकार सखी

उस का माथा हिम पर्बत सा ऊँचा और चमकीला है
और उस के कोमल अधरों से बहती है रसधार सखी

उस की ज़ुल्फ़ें काली शब हैं, शाने उगते सूरज से
और ये रातें चूम रही हैं दिन को बारम्बार सखी

श्वेत हिरन के जैसे मेरे पोरे और उस का सीना
शब के जंगल छान रहे हैं पाँचों पक्के यार सखी

इक यूसुफ़ है जिस की ख़ातिर उँगलियाँ काटे बैठी हूँ
एक मसीहा के चक्कर में हो गई हूँ बीमार सखी

हम दोनों के यार सखी री सब के सब अलबेले हैं
मैं लैला की पक्की सहेली वो मजनू के यार सखी

— Naeem Sarmad

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