हालत-ए-हाल में आदाब नहीं भूलता मैं

ख़ुद को भूलूँ भी तो अहबाब नहीं भूलता मैं

मैं अभी इश्क़ नहीं हालत-ए-ईमान में हूँ
जंग करते हुए अस्बाब नहीं भूलता मैं

जज़्ब करती हुई ख़िल्क़त से मोहब्बत है मुझे
चाँद को छोड़िए तालाब नहीं भूलता मैं

ऐ मुझे ख़्वाब दिखाते हुए लोगों सुन लो
मेरा दुख ये है कोई ख़्वाब नहीं भूलता मैं

पारसाई नहीं तन्हाई मुयस्सर थी वहाँ
सो तिरे मिम्बर-ओ-मेहराब नहीं भूलता मैं

— Nadeem Bhabha

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