इसी उलझन में उम्र सारी बसर की
ये छाया सूरज की है या शजर की
एक दिन मैं अपने घर मेहमान हुआ
ताक पर रख दी आवारगी ज़िन्दगी भर की
मैं ने हादसों से अपनी झोली भर ली
जैसे कमाई हो किसी लंबे सफ़र की
कोई इतना मुतमईन कैसे हो सकता है
जाम भी ना लिया ज़िन्दगी भी बसर की
दिन तो कयामत था गुज़ारा नहीं गया
रात तो ज़िन्दगी थी सो बसर की
हाँ फसाना तो मैं भूल गया लेकिन
कुछ गलियाँ याद है तेरे शहर की
— Murli Dhakad















