नहीं होती अगर बारिश तो पत्थर हो गए होते

ये सारे लहलहाते खेत बंजर हो गए होते

तेरे दामन से सारी शहर को सैलाब से रोका
नहीं तो मेरे ये आँसू समुंदर हो गए होते

तुम्हें अहल-ए-सियासत ने कहीं का भी नहीं रक्खा
हमारे साथ रहते तो सुख़न-वर हो गए होते

अगर आदाब कर लेते तो मसनद मिल गई होती
अगर लहजा बदल लेते गवर्नर हो गए होते

— Munawwar Rana

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