आरज़ू अब के बद-हवा से न थी

हम को क़िस्मत से इतनी आस न थी

आज पहली दफ़ा शराब चखी
उन के होंठों के आस-पास न थी

वक़्त-ए-रुख़्सत वो हम को चेहरे से
लग रही थी मगर उदास न थी

बा'द मुद्दत के उन का फ़ोन आया
नर्म लहजा था पर मिठास न थी

शक्ल ही ऐसी कुछ मिली थी हमें
वजह उदासी की कोई पास न थी

शरबतों से बुझा भी लेते मगर
इतनी जाहिल हमारी प्यास न थी

— Manmauji

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