इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया
ख़ुद-ब-ख़ुद घबरा के क़दमों में ज़माना आ गया
हुस्न बला का कातिल हो पर आखिर को बेचारा है
इश्क़ तो वो कातिल जिसने अपनों को भी मारा है
ये धोखे देता आया है दिल को भी दुनिया को भी
इसके छल ने खार किया है सहरा में लैला को भी
इश्क़ क्या है ख़ूबसूरत सी कोई अफ़वाह बस
वो भी मेरे और तुम्हारे दरमियाँ उड़ती हुई
हुस्न बख़्शा जो ख़ुदा ने आप बख़्शें दीद अपनी
आरज़ू–ए–चश्म पूरी हो मुकम्मल ईद अपनी
अगर बेदाग़ होता चाँद तो अच्छा नहीं लगता
मोहब्बत ख़ूबसूरत दाग़ है, बेदाग़ से दिल पर
तुम्हारे साथ था तो मैं गम-ए-उल्फ़त में उलझा था
तुम्हें छोड़ा तो ये जाना कि दुनिया ख़ूबसूरत है
बला की ख़ूबसूरत वो उसे ही देख जीता हूँ
मुझे उसकी ज़रूरत है, न मैं उसका चहीता हूँ
कभी उसको परेशानी मिरे सिगरेट से होती थी
उसे बोलो अभी कोई कि मैं दारू भी पीता हूँ
तुम्हारे साथ इतना ख़ूबसूरत वक़्त गुज़रा है
तुम्हारे बाद हाथों में घड़ी अच्छी नहीं लगती