तन्हाई ही तन्हाई है, मौला ख़ैर करे

ख़ाना-ए-दिल पर जो छाई है, मौला ख़ैर करे

जानाँ तेरी यादों में अब अश्क बहाने की
फिर ये आँख तमन्नाई है, मौला ख़ैर करे

ज़ख़्म-ए-दिल है, मैं हूँ, और उदासी है हर-सू
अब जान मेरी घबराई है मौला ख़ैर करे

तेरी राहें तकते-तकते, मेरी आँखों की
बुझने पर अब बीनाई है, मौला ख़ैर करे

हाल न पूछा, उस ने मेरी ज़र्द तबीअत का
यार भी मेरा हरजाई है, मौला ख़ैर करे

मेरे सर इल्ज़ाम लगे हैं, तर्क-ए-उल्फत के
मेरे हिस्से रुसवाई है, मौला ख़ैर करे

याँ तो वो ही मुंसिफ़ भी है और क़ातिल भी है
ज़ेर ए अदालत सुनवाई है, मौला ख़ैर करे

बीमार-ए-उल्फ़त हूँ मैं आज़ाद, मगर ख़ुश हूँ,
उस की हिम्मत-अफ़ज़ाई है, मौला ख़ैर करे

— Moin Ahmed "Aazad"

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