धूप ने गुज़ारिश की
एक बूँद बारिश की
लो गले पड़े काँटे
क्यूँ गुलों की ख़्वाहिश की
जगमगा उठे तारे
बात थी नुमाइश की
इक पतिंगा उजरत थी
छिपकिली की जुम्बिश की
हम तवक़्क़ो' रखते हैं
और वो भी बख़्शिश की
लुत्फ़ आ गया 'अल्वी'
वाह ख़ूब कोशिश की
— Mohammad Alvi
एक बूँद बारिश की
लो गले पड़े काँटे
क्यूँ गुलों की ख़्वाहिश की
जगमगा उठे तारे
बात थी नुमाइश की
इक पतिंगा उजरत थी
छिपकिली की जुम्बिश की
हम तवक़्क़ो' रखते हैं
और वो भी बख़्शिश की
लुत्फ़ आ गया 'अल्वी'
वाह ख़ूब कोशिश की
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