अभी तो और भी दिन बारिशों के आने थे

करिश्में सारे उसे आज ही दिखाने थे

हिक़ारतें ही मिलीं हम को ज़ंग-आलूदा
दिलों में यूँ तो कई क़िस्म के ख़ज़ाने थे

ये दश्त तेल का प्यासा न था ख़ुदा-वंदा
यहाँ तो चार छे दरिया हमें बहाने थे

किसी से कोई तअ'ल्लुक़ रहा न हो जैसे
कुछ इस तरह से गुज़रते हुए ज़माने थे

परिंदे दूर फ़ज़ाओं में खो गए 'अल्वी'
उजाड़ उजाड़ दरख़्तों पे आशियाने थे

किसी से कोई तअ'ल्लुक़ रहा न हो जैसे
कुछ इस तरह से गुज़रते हुए ज़माने थे

परिंदे दूर फ़ज़ाओं में खो गए 'अल्वी'
उजाड़ उजाड़ दरख़्तों पे आशियाने थे

— Mohammad Alvi

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