किसी की मर्ज़ी को अपनी क़िस्मत बना चुके हैं
हम अपने हाथों की सब लकीरें मिटा चुके हैं
चलो समुंदर की वुसअतों में सुकून ढूँढ़े
कि साहिलों पर बहुत घरौंदें बना चुके हैं
उन्हीं छतों से हमारे आँगन में मौत बरसी
वही छतें जिन से हम पतंगें उड़ा चुके हैं
— Meraj Faizabadi















