पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी

जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी

दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे
हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी

ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले
भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी

संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले
नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी

— Mahboob Khizan

More by Mahboob Khizan

Other ghazal from the same pen

See all from Mahboob Khizan →

Hasrat Shayari

Shers of hasrat.

All Hasrat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling