मैं बहार-ए-दिल-ए-शाइ'र हूँ तो अब सारे गुलाब

खिल उठेंगे मिरी बू से मिरे जाने के बा'द

मिरे होने की नहीं क़द्र कभी तू ने की
तू मिरा नाम नहीं ले मिरे जाने के बा'द

वो जो हँसते थे मिरे हाल पे कुछ दिन पहले
वो भी बे-साख़्ता रोए मिरे जाने के बा'द

जो कभी भी मिरे पहलू में नहीं बैठे थे
वो मिरे सोग में बैठे मिरे जाने के बा'द

मुंतज़िर जिस की रही एक ज़माना 'माहम'
वो भी जब आए तो आए मिरे जाने के बा'द

— Maaham Shah

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