कभी इश्क़ से कभी प्यार से
कभी मौसमों की बहार से
शब-ए-हिज्र रौशनी हो गई
मिरे आँसुओं की क़तार से
न बहल सकी न निकल सकी
तिरे दिल के एक भी तार से
न ही तेरे दिल में ठहर सकी
कभी इज़्तिराब-ओ-क़रार से
मैं निकल के अब कहाँ जाऊँगी
तिरी चाहतों के हिसार से
ये जो चश्म-ए-'माहम' उबल पड़ी
तिरे ख़्वाब ही के ख़ुमार से
— Maaham Shah















