हिज्र लाज़िम है तो ये हिज्र निभाए जाओ

जा रहे हो तो कोई रब्त बनाए जाओ

जो भी इस दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहो
कैसे मुमकिन है किताबो से भुलाए जाओ

शायद ये तर्ज़ किसी रूह में घर कर जाए
ऐन मुमकिन है किसी दिल में बसाए जाओ

ये मिरी रात भी उम्मीद लगाए हुए है
उस के दामन से कोई सुब्ह लगाए जाओ

गुफ़्तुगू करते अगर साथ में होते कुछ देर
जाते जाते मुझे इक शे'र सुनाए जाओ

मेरी तख़्लीक़ को आवाज़ बना दो 'माहम'
मेरी तहरीर की ख़ामोशी मिटाए जाओ

— Maaham Shah

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