मैं टूटता रहूँ ऐसी तिरी रज़ा तो नहीं

हवा-ए-तुंद में शामिल तिरी अदा तो नहीं

मैं चौंक उठा हूँ बहुत अपनी चुप के सहरा में
जो आ रही है कहीं मेरी ही सदा तो नहीं

न जाने कौन सी मंज़िल शिकस्त की आई
मिरी पुकार में पहले ये दर्द था तो नहीं

फ़ुग़ाँ पे तंग हुआ लफ़्ज़-ओ-सौत का सहरा
मिरा ख़राबा-ए-जाँ बे-कनार था तो नहीं

गुज़र सका न कोई इस दयार से अब तक
सुकूत-ए-दिल के पस-ए-पर्दा इक ख़ला तो नहीं

— Lutf-ur-rahman

More by Lutf-ur-rahman

Other ghazal from the same pen

See all from Lutf-ur-rahman →

Dard Shayari

Shers of dard.

All Dard Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling