इबारत से वरक़ आरी रहेगा
मगर लिखना मिरा जारी रहेगा
अज़ल की सुब्ह से शाम-ए-अबद तक
नशा मुझ पे तो ये तारी रहेगा
ख़ुदाई है तो है कोई ख़ुदा भी
न हो शाइ'र तो कब क़ारी रहेगा
जो नाज़-ए-कज-कुलाही से है ग़ाफ़िल
वही फ़नकार दरबारी रहेगा
मोहब्बत करने वालों का जहाँ से
अजब इक रिश्ता-ए-ख़्वारी रहेगा
बंधी है जिस के सर दस्तार-ए-शाही
वो सूफ़ी जिंस बाज़ारी रहेगा
— Lutf-ur-rahman















