रौनक़-ए-दामन-ए-सद-चाक कहाँ से लाएँ

शहर में दश्त की पोशाक कहाँ से लाएँ

हालत-ए-जज़्ब में इदराक कहाँ से लाएँ
ज़हर के वास्ते तिरयाक कहाँ से लाएँ

गर्द-हा-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक कहाँ से लाएँ
इस क़दर गर्दिश-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ

पानी ले आए हैं अब एक नई उलझन है
कूज़ा-गर तेरे लिए ख़ाक कहाँ से लाएँ

चेहरा-मोहरा तो बहर-हाल दमक ही लेगा
ताबिश-ए-चश्मा-ए-नम-नाक कहाँ से लाएँ

तुझ को बिल्कुल नहीं एहसास-ए-हुनर ऐ दरिया
अब तिरे वास्ते तैराक कहाँ से लाएँ

ख़ाक-ज़ादे हैं सो बस एक ही रंगत है नसीब
ख़ुद में सद-रंगी-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ

हम भी जी भर के तुझे कोसते फिरते लेकिन
हम तिरा लहजा-ए-बे-बाक कहाँ से लाएँ

— Liaqat Jafri

More by Liaqat Jafri

Other ghazal from the same pen

See all from Liaqat Jafri →

Beautiful Kashmir Shayari

Shers of beautiful kashmir.

All Beautiful Kashmir Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling