लफ़्ज़ को इल्हाम मअ'नी को शरर समझा था मैं

दर-हक़ीक़त ऐब था जिस को हुनर समझा था मैं

रौशनी थी आँख थी मंज़र था फिर कुछ भी न था
हाए किस आशोब को अपनी नज़र समझा था मैं

आसमानों को लपकते हैं ज़मीं-ज़ादे सभी
मुर्ग़-ए-आदम-ज़ाद को बे-बाल-ओ-पर समझा था मैं

''कुन'' का अफ़्सून-ए-अज़ल फूँका गया था जिस घड़ी
मुझ को अब भी याद है बार-ए-दिगर समझा था मैं

है कोई? जो मेरे इस लम्हे पे गिर्या कर सके
जब मुझे बिल्कुल समझ न थी मगर समझा था मैं

अपने बच्चों की तरह उस ने उड़ाया मुझ को साथ
जिस हवा-ए-तुंद-ख़ू को दर-ब-दर समझा था मैं

मुझ पे फ़र्सूदा अक़ाएद की अजब यलग़ार थी
छोटे छोटे वसवसों को ख़ैर-ओ-शर समझा था मैं

रेगज़ार-ए-शब-गज़ीदा तुझ में ता-हद्द-ए-नज़र
धूप का आसेब था जिस को शजर समझा था मैं

बे-सर-ओ-सामानियों की इंतिहा थी 'जाफ़री'
जब दर-ओ-दीवार को दीवार-ओ-दर समझा था मैं

बाब-ए-हैरत जब तलक खुलता लियाक़त-'जाफ़री'
क़ैस को फ़रहाद को आशुफ़्ता-सर समझा था मैं

— Liaqat Jafri

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Garmi Shayari

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