ता-दश्त-ए-अदम आह-ए-रसा ले गई मुझ को

जब ख़ाक हुआ मैं तो हवा ले गई मुझ को

कोसों मय-ए-गुलगूँ की हवा ले गई मुझ को
ये लाल परी घर से उड़ा ले गई मुझ को

मुद्दत से न मिलती थी कहीं राह अदम की
उस शोख़ के कूचे में क़ज़ा ले गई मुझ को

था ज़ोफ़ में सौदा किसी सहरा-ए-जुनूँ का
वहशत मिरे घर आ के बुला ले गई मुझ को

'जौहर' तरफ़-ए-कूचा-ए-जानाँ जो गया मैं
क्या जाने किधर की ये हवा ले गई मुझ को

— Lala Madhav Ram Jauhar

More by Lala Madhav Ram Jauhar

Other ghazal from the same pen

See all from Lala Madhav Ram Jauhar →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling