"माँ-बाप बिना"

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।

माँ कोख में ले कर चलती है, पिता सोच में ले कर चलते है।
बच्चों को कोई तकलीफ़ न हो, फर्ज़ों का बोझ उठा कर चलते है।
अपनी क़लम से लिख इनका, गुणगान भी कर के जाऊँगा।

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।

माँ-बाप के लाड़ प्यार में, डाँट तो बेशक होती है।
बच्चे कितने भी हो लेकिन, उन्हे फ़िक्र सभी की होती है।
उन की इस शिक्षा से मैं, हर मैदान फतेह कर जाऊँगा।

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।

कैसे भूलूँ आधीरात में, माँ का गीले से सूखे पर सुलाना।
कैसे भूलूँ उस बाप को, अपना पेट काट मुझ को खिलाना।
मैं तुम दोनो के बलिदान का, कभी कर्ज चुका न पाऊँगा।

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।

उन बच्चों के भी क्या कहने, जो माँ-बाप से अलग हो जाते है।
उन से कोई तकलीफ़ न हो, वृद्ध आश्रम छोड़कर जाते है।
रब्ब बोले ऐसी औलाद को, कभी माफ़ न मैं कर पाऊँगा।

वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।

— Kushal "PARINDA"

More by Kushal "PARINDA"

Other nazm from the same pen

See all from Kushal "PARINDA" →

Majboori Shayari

Shers of majboori.

All Majboori Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling