KUNAL
KUNAL
Ghazal

मरने पे सबके रोता है कैसा है आदमी

सचमुच में ज़िंदा कब यहाँ होता है आदमी

सब से हसीं फ़रेब है दुनिया में औरतें
सब से बुरा ज़माने में धोखा है आदमी

सूरज को देखता हूँ तो लगता है यूँ मुझे
सीने में आसमान के जलता है आदमी

सिगरेट, शराब और सभी जानलेवा ऐब
मरता नहीं, इन्ही से तो जीता है आदमी

उस को बिछड़ते वक़्त नहीं अलविदा कहा
मरने के बा'द भी कभी बोला है आदमी

इतराए वो बनाके वहाँ एक आदमी
लाखों ख़ुदा बनाके याँ बैठा है आदमी

शैतान,जानवर,कभी काफ़िर कभी ख़ुदा
एक आदमी को छोड़ के क्या क्या है आदमी

भगवान तो चलो कभी आजाए सपने में
पर सच बताओ क्या कभी देखा है आदमी

बनता है ख़ून, मांस व हड्डी को जोड़ कर
मिट्टी से यार कब भला बनता है आदमी

मेरा बनाया वो ख़ुदा महलों में रहता है
उस का बनाया सड़कों पे रहता है आदमी

— KUNAL

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