है जो कुछ पास अपने सब लिए सरकार बैठे हैं

जो चाहें आप ले जाएँ सरे-बाज़ार बैठे हैं

मनाओ जश्न मंज़िल पर पहुंच जाने का तुम लेकिन
ख़बर उन की भी लो यारों जो हिम्मत हार बैठे हैं

तू अब उस शहर भी जा कर सुकूँ पाएगा क्या आख़िर
वहाँ भी कौन-से ऐ दिल तेरे ग़मख़्वार बैठे हैं

न तू आया, न याद आई तेरी इक लंबे अरसे से
हज़ारों काम होने पर भी हम बेकार बैठे हैं

उन्हीं से नाम है तेरा, न भूल इतना तो ऐ साक़ी
तेरे मैख़ाने में अब भी कुछ-इक ख़ुद्दार बैठे हैं

गए वो वक़्त कहते थे कि इतने दोस्त हैं अपने
मुक़द्दर जानिए अच्छा अगर दो-चार बैठे हैं

किसी भी वक़्त आ सकता है अब पैग़ाम बस उस का
सुना जिस वक़्त से हम ने 'सलिल' तैयार बैठे हैं

— Kuldeep Salil

Justaju Shayari

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