ता-चंद बहर-ए-ग़म में दिल-ए-ज़ार जाएगा

आख़िर जहाँ थमेगा वहीं हार जाएगा

बहता हुआ सफ़ीना-ए-उम्र-ए-दो रोज़ा में
ख़्वाबीदा जाएगा कोई बेदार जाएगा

बरसेगी आसमाँ से किसी दिन दवा-ए-मर्ग
रू-ए-ज़मीं से ज़ीस्त का आज़ार जाएगा

मासूम ताइरों के लिए दिल-गिरफ़्ता हूँ
इन को भी आदमी का अमल मार जाएगा

आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर
रोना तमाम उम्र का बेकार जाएगा

वो तेरे रू-ब-रू मेरा आईने का सुकूत
ता-उम्र ज़ेहन से न वो इसरार जाएगा

इस बज़्म से सुबुक न उठेगा कभी कोई
हर शख़्स आरज़ू से गराँ-बार जाएगा

— Khursheed Rizvi

More by Khursheed Rizvi

Other ghazal from the same pen

See all from Khursheed Rizvi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling