हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के

ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के

यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी
ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के

वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन
उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के

वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता
ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के

वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम'
सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के

— Khurram Afaq

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Faasla Shayari

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