हम तो समझे थे मोहब्बत की लड़ाई साहब
आप तलवार उठा लाए हैं भाई साहब
धूप तालाब का हुलिया तो बदल सकती है
इतनी आसानी से छुटती नहीं काई साहब
ख़ाक को ख़ाक पे धरने का मज़ा अपना है
हिज्र में कौन बिछाता है चटाई साहब
फिर भी आवारगी ज़ाएअ' नहीं जाने वाली
कोई भी चीज़ अगर हाथ न आई साहब
— Khurram Afaq















