अगर किनारे पे ठेरने की जगह नहीं है

तो उस सफ़ीने से अच्छी कोई जगह नहीं है

जो हो सके तो अभी से सामान बाँध लीजे
वो ख़ुद न कह दे यहाँ पर इतनी जगह नहीं है

तिरे बराबर में रहने वाले तो कहते होंगे
कि इस ज़मीं पर कहीं भी ऐसी जगह नहीं है

तो क्यूँ न ख़ामोश रह के हमदर्दियाँ समेटें
उसे पता है कि ये हमारी जगह नहीं है

ये कैसे दिल में बसेरा करने को आ गए हम
कि जिस के अतराफ़ में भी ख़ाली जगह नहीं है

— Khurram Afaq

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Manzil Shayari

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