मुसलसल रो रहा हूँ फिर भी क्यूँँ रोने से डरता हूँ
जिसे पाया नहीं अब तक उसे खोने से डरता हूँ
सुनहरा ख़्वाब बनकर इक अज़ाब आँखों पे उतरा था
ज़माना हो गया पर आज भी सोने से डरता हूँ
बहुत ज़रख़ेज़ है दिल की ज़मीं मालूम है लेकिन
वफ़ा के बीज इस मिट्टी में फिर बोने से डरता हूँ
— Kashif Sayyed















