हाल पूछा न करे हाथ मिलाया न करे
मैं इसी धूप में ख़ुश हूँ कोई साया न करे
मैं भी आख़िर हूँ इसी दश्त का रहने वाला
कैसे मजनूँ से कहूँ ख़ाक उड़ाया न करे
आइना मेरे शब-ओ-रोज़ से वाक़िफ़ ही नहीं
कौन हूँ क्या हूँ मुझे याद दिलाया न करे
ऐन-मुमकिन है चली जाए समा'अत मेरी
दिल से कहिए कि बहुत शोर मचाया न करे
मुझ से रस्तों का बिछड़ना नहीं देखा जाता
मुझ से मिलने वो किसी मोड़ पे आया न करे
— Kashif Husain Ghair















